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गुरुवार, 17 मई 2012

लिंकन का परोपकार


-संध्या पेडणेकर
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन बहुत दयालु थे।
एक बार वह अपने मित्र के साथ एक सभा में जा रहे थे।
रास्ते में उन्होंने देखा कि सुअर का एक पिल्ला कीचड़ भरे गड्‌ढे में फंसा है और तडप रहा है।
लिंकन ने बग्घी रुकवाई और गड्‌ढे में उतरकर उसे कीचड से बाहर निकाला।
इस कोशिश में उनके कपडे गंदे हो गए और सभा के लिए थोडी देर भी हो गई।
उन्होंने वहीं से पानी लेकर हात-पैर साफ किए और बिना कपडे बदले वह सभा में चले गए।
उनके गंदे कपडे देख कर हर कोई उनके मित्र से उसकी वजह पूछता।
सभा जब प्रारंभ हुई तब उनका परिचय कराते हुए आयोजक ने बताया, लिंकनसाहब इतने दयालु हैं कि कीचड मं फंसे सूअर के एक बच्चे की तडप वह सह नहीं सके, उसे कीचड से निकाला तभी उन्हें संतोष मिला।
लिंकन ने खडे होकर उनकी बात को दुरुस्त किया,  कहा कि, आप लोगों को गलतफहमी हुई है। पिल्ला तडप रहा था इसलिए नहीं वरन्‌ उसे तडपता देख कर मुझे दुख हो रहा था इसलिए मैंने उसे बाहर निकाला। जो कुछ भी किया मैंने अपने लिए किया।
परोपकार को भी स्वान्तःसुखाय बतानेवाले लिंकन महान थे।
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किसीको भी दया का पात्र न समझो।
हम किसी और से ऊपर नहीं।
दान इसलिए न दो कि पानेवाला ज़रूरतमंद है।
गौर करें,
दान में भी पुण्य कमाने की वृत्ति हमने पाल ली है।
बिना स्वार्थ के हम कुछ नहीं करते।
क्या कभी कोई बात हम औरों के लिए भी करते हैं?
करते भी हैं तो क्या उसे जताने से चूकते हैं?
कडी घाम में प्यासों की प्यास मिटाना कितना बड़ा पुण्यकार्य है...
इस पुण्य का श्रेय पाने के लिए प्याऊ पर हम अपना या पुरखों का नाम चस्पां करते हैं।
मंदिर में सीढ़ियां बनाने के लिए दिए दान का ऐलान सीढ़ियों के पट्ट पर करते हैं।
यहां तक कि भगवान की मूर्ति गढवाने में लगी रकम का श्रेय बटोरने से भी नहीं चूकते।
बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं, दान ऐसे दो कि इस हाथ का दिया उस हथ को पता न चले।
दान देनेवाले को अहंकार न हो, और
दान लेनेवाले को कुंठा न हो...
अव्वल तो किसी के लिए कुछ करो ही मत
और अगर करो तो यूं कि गोया अपने लिए किया हो।